श्रीलंका में बौद्धधर्म के विकास में भारत का योगदान-एक समीक्षा

Title

India's Contribution to the Development of Buddhism in Sri Lanka: A Review

Eastern Scientist | www.easternscientist.in
Print ISSN: 2581-7884 | ISSN-L: 2581-7884 | Volume III | Issue 36 | July–September 2026
REVIEW ARTICLE
मनोज कुमार1
1असि.प्रोफेसर,स्नातकोत्तर विभाग, प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्त्व विभाग, पटना विश्वविद्यालय, पटना
*Corresponding Author: डॉ.मनोज कुमार | Email:dr.manojaihpu@gmail.com
DOI :

Abstract

Sri Lanka is India's oldest colony. Megasthenes also mentioned India's relations with Tamraparni. Presently, Sri Lanka is a separate and completely sovereign island nation situated in the northern part of the Indian Ocean in South Asia. Located to the south of India, this country is a mere 31 kilometers away. Until 1972, its name was Ceylon, which was changed to Lanka in 1972, and in 1978, the honorific "Sri" was added, making it Sri Lanka. From a cultural perspective, it can be considered a part of India. There are two Pali language texts named Dipavamsa and Mahavamsa that shed light on the history of Sri Lanka. The Mahavamsa was composed in the sixth century, and its author was Mahanama. The Dipavamsa is two centuries older, but its author's name remains unknown. According to ancient Sri Lankan tradition, Prince Vijaya Singh of the Lata (Gujarat) region landed in Lanka with his companions in the same year that Lord Buddha attained Nirvana (483 BCE). At that time, this island was called Tamraparni. The island is mentioned by this very name in the inscriptions of King Ashoka as well. Vijaya Singh's father's name was Sinhabahu or Sinhala. Tamraparni derived the name Sinhala from him. Its more famous name is Lanka or Sri Lanka. In the ancient tradition of Lanka, Vijaya Singh is described as a resident of 'Lal', and by equating Lal with Rarh, it is assumed that Vijaya Singh traveled to Tamraparni from the Rarh country. Geographically, Lanka is a part of India. Its ancient history has largely been similar to that of other Indian janapadas or regions. Just as there were constant wars between Kashi and Kosala, Magadha and Vajjisangha, and Vatsa and Avanti during the Buddhist era, or the types of conflicts that took place between the Rashtrakutas and Chalukyas, and the Palas and Gurjara-Pratiharas during the medieval period, similar conflicts occurred between the kings of Lanka and the Chola and Pandya kings of southern India. Sometimes the Chola or Pandya kings emerged victorious and succeeded in establishing their dominance over all of Lanka or its northern regions, and sometimes the kings of Lanka reached as far as Madurai on their victory campaigns. Thus, India and Lanka shared a close relationship in the political sphere.

Keyword:India, Ceylon, Dipavamsa, Mahavamsa, Tamraparni

सारांश

श्रीलंका भारत की सबसे पुरानी कॉलोनी रही है। मेगस्थनीज ने भी भारत और ताम्रपर्णी के संबंधों का ज़िक्र किया है। अभी, श्रीलंका दक्षिण एशिया में हिंद महासागर के उत्तरी हिस्से में स्थित एक अलग और पूरी तरह से आज़ाद द्वीपीय देश है। भारत के दक्षिण में स्थित यह देश भारत से सिर्फ़ 31 किलोमीटर दूर है। 1972 तक इसका नाम सीलोन था, जिसे 1972 में बदलकर लंका कर दिया गया और 1978 में इसमें सम्मानजनक शब्द "श्री" जोड़ा गया, जिससे यह श्रीलंका बन गया। सांस्कृतिक नज़रिए से इसे भारत का ही एक हिस्सा माना जा सकता है। पाली भाषा के दो ग्रंथ हैं - दीपवंश और महावंश - जो श्रीलंका के इतिहास पर रोशनी डालते हैं। महावंश छठी सदी में लिखा गया था और इसके लेखक महानाम थे। दीपवंश दो सदी पुराना है, लेकिन इसके लेखक का नाम पता नहीं है। श्रीलंका की पुरानी परंपरा के अनुसार, लाट (गुजरात) इलाके के राजकुमार विजय सिंह अपने साथियों के साथ उसी साल लंका पहुँचे थे, जिस साल भगवान बुद्ध को निर्वाण (483 ईसा पूर्व) मिला था। उस समय इस द्वीप को ताम्रपर्णी कहा जाता था। राजा अशोक के शिलालेखों में भी इस द्वीप का ज़िक्र इसी नाम से मिलता है। विजय सिंह के पिता का नाम सिंहबाहु या सिंहल था। ताम्रपर्णी को सिंहल नाम उन्हीं से मिला। इसका ज़्यादा मशहूर नाम लंका या श्रीलंका है। लंका की पुरानी परंपरा में विजय सिंह को 'लाल' का निवासी बताया गया है, और 'लाल' को 'राढ़' (Rarh) के बराबर मानकर यह माना जाता है कि विजय सिंह ने राढ़ देश से ताम्रपर्णी की यात्रा की थी। भौगोलिक रूप से, लंका भारत का ही एक हिस्सा है। इसका पुराना इतिहास काफ़ी हद तक भारत के दूसरे जनपदों या इलाकों जैसा ही रहा है। जैसे बौद्ध काल में काशी और कोसल, मगध और वज्जिसंघ, और वत्स और अवंती के बीच लगातार लड़ाइयाँ होती थीं, या मध्यकाल में राष्ट्रकूटों और चालुक्यों, और पालों और गुर्जर-प्रतिहारों के बीच टकराव होते थे, वैसे ही लंका के राजाओं और दक्षिण भारत के चोल और पांड्य राजाओं के बीच भी टकराव हुए थे। कभी-कभी चोल या पांड्य राजा विजयी होते थे और पूरी लंका या उसके उत्तरी इलाकों पर अपना दबदबा कायम करने में सफल हो जाते थे, और कभी-कभी लंका के राजा अपनी जीत की मुहिम में मदुरै तक पहुँच जाते थे। इस तरह, राजनीतिक क्षेत्र में भारत और लंका के बीच करीबी रिश्ते थे।

Keywords:भारत, सीलोन, दीपवंश, महावंश, ताम्रपर्णी

1.प्रस्तावना एवं सांस्कृतिक सम्बन्ध

संस्कृति या प्रति-पीढ़ि के संस्कारों का प्रवाह, प्रवाह की भांति देश और काल के अनुसार आदान-प्रदान करते रूपांतरित होता रहता है। बौद्ध संस्कृति भारत की संस्कृति का अभिन्न अंग है। बौद्ध संस्कृति ने हर देश में जाकर वहाँ के रंग में रंग गई। ‘दृष्टिकोण उदार और बौद्ध, किन्तु रूप हो राष्ट्रीय-इस सूत्र का उसने अक्षरशः पालन किया। इसलिए बौद्ध देशों में विदेशी और स्वदेशी संस्कृतियों का संघर्ष नहीं हुआ और न धर्म के नाम पर एक ही जाति के अनेक टुकड़े बने।

श्रीलंका भारत का सबसे पुराना उपनिवेश है। मेगास्थनीज1 ने भी ताम्रपर्णी के साथ भारत के साथ संबंधों का उल्लेख किया है। वर्तमान समय में श्रीलंका एक पृथक एवं संपूर्ण-प्रभुत्व-सम्पन्न राज्य दक्षिण एशिया में हिन्द महासागर के उत्तरी भाग में स्थित एक द्वीपीय देश है। भारत के दक्षिण में स्थित इस देश की दूरी भारत से मात्र 31 किलोमीटर है। 1972 तक इसका नाम सीलोन (अंग्रेजी- Ceylon) था, जिसे 1972 में बदलकर लंका तथा 1978 में इसके आगे सम्मान सूचक शब्द ‘‘श्री’’ जोड़कर श्रीलंका कर दिया गया।

सांस्कृतिक दृष्टि से उसे भारत का एक भाग समझा जा सकता है। दीपवंश तथा महावंश नाम के पालि भाषा के दो ग्रंथ है जिससे श्रीलंका के इतिहास पर प्रकाश पड़ता है। महावंश की रचना छठी सदी में हुई थी और उसके लेखक महानाम था। दीपवंश उससे दो सदी पुराना है पर उसके रचयिता का नाम ज्ञात नहीं है।

2.ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं राजनीतिक सम्बन्ध

श्रीलंका की प्राचीन अनुश्रुति के अनुसार लाट (गुजरात) देश का राजकुमार विजयसिंह अपने साथियों के साथ उसी साल लंका में उतरा था जिस साल भगवान बुद्ध का निर्वाण प्राप्त हुआ था (483 ई. पू.) इस समय इस द्वीप को ताम्रपर्णी कहते थे। राजा अशोक के शिलालेखों में भी इसी नाम से इस द्वीप का उल्लेख किया गया है। विजय सिंह के पिता का नाम सिंहबाहु या सिंहल था। उसी के नाम से ताम्रपर्णी का सिंहल नाम पड़ा। इसका अधिक प्रसिद्ध नाम लंका या श्रींलंका दिया है।

लंका की प्राचीन अनुश्रुति में विजयसिंह को ‘लाल’ का 2 निवासी कहा गया है और लाल को राढ़ से मिलाकर यह मान लिया गया है कि विजयसिंह राढ़ से मिलाकर यह मान लिया गया है कि विजयसिंह राढ देश से ताम्रपर्णी गया था। भौगोलिक दृष्टि से लंका भारत का ही अंग है। उसका प्राचीन इतिहास प्रायः वैसा ही रहा है, जैसा कि भारत के अन्य जनपदों या प्रदेशों का था। बौद्ध युग में काशी और कोशल, मगध और वज्जिसंघ तथा वत्स और अवन्ति में जैसे युद्ध होते रहते थे या मध्यकाल में राष्ट्रकूट और चालुक्य तथा पाल और गुर्जर प्रतिहारों में जिस ढंग के संघर्ष होते रहते थे प्रायः वैसे ही संघर्ष लंका के राजाओं के दक्षिणी भारत के चोल व पाण्डय राजाओं के साथ हुए। कभी चोल या पाण्डय राजा विजयी हुए और संपूर्ण लंका या उसके उत्तरी प्रदेशों पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने में समर्थ हुए और कभी लंका के राजा विजय यात्रा करते हुए मदुरा तक आ पहुँचे। इस प्रकार राजनीतिक क्षेत्र में भारत और लंका का घनिष्ट संबंध रहा।

लंका और भारत का संबंध केवल युद्धों तक सीमित नहीं था। लंका के राजा श्रीमेघवर्ण ने अपने शासन के नौवें वर्ष में अपने दो दूत गुप्तवंशी सम्राट समुद्रगुप्त की सेवा में इस प्रयोजन से भेजे थे ताकि वे गया में एक बौद्ध विहार बनवाने की अनुमति प्राप्त करें। यह विहार लंका के राजा की ओर से बोधगया में बनवाया गया था। लंका और भारत के राजाओं में विवाह संबंध भी होते थे। लंका के राजा महेन्द्र श्री संघबोधि (953-69) का विवाह कलिंग (उड़ीसा) की राजकुमारी के साथ हुआ था। ऐसे ही अनेकों उदाहरण मिलते हैं। लंका में बौद्ध धर्म का प्रवेश भारत के स्थविरों और भिक्षुओं द्वारा ही हुआ था। भारत से लंका जाने वाले बौद्ध विद्वानों की परम्परा चिरकाल तक कायम रही। पांचवीं सदी के प्रारंभ में आचार्य बुद्धघोष भारत से लंका गये थे और वहाँ उन्होंने पालि की अट्ठकथाओं को देखकर अपनी अट्ठकथाएँ लिखी थी। राजा पराक्रमबाहु के बाद जब लंका में अव्यवस्था छा गया और भिक्षु परम्परा लुप्त हो गई तो उसके एक उत्तराधिकारी ने भिक्षु संघ की पुनःस्थापना के लिए चोल देश से बौद्ध भिक्षुओं को बुलवाया और उनके द्वारा फिर से लंका से संघ का पुनरुद्धार कराया। लंका की प्रधान भाषा सिंहल है, जो उसी प्रकार से आर्य भाषा परिवार की है जैसे कि हिन्दी, बंगाली आदि है। वहाँ की धार्मिक भाषा पालि है जो अशोक के समय में भारत की राजभाषा थी। बौद्धधर्म के जिस साहित्य व धार्मिक परम्पराओं का भारत में विकास हुआ था लंका में वही अब तक विद्यमान है।

3.वास्तु एवं मूर्तिकला पर भारतीय प्रभाव

लंका में विहार तथा स्तूपों का निर्माण भारतीय वास्तुकला के अनुसार हुआ है। प्रायः ये उसी ढंग के बने हैं जैसे प्राचीन काल के भारतीय स्तूप और विहार थे। इनमें जों मूर्तियाँ हैं, वे अमरावती और नागार्जुनीकोण्ड की मूर्तिकला के अनुसार निर्मित है। लंका में कतिपय पौराणिक हिन्दू मंदिरों का भी उस काल में निर्माण किया गया था, जबकि वहाँ चोल राजाओं का आधिपत्य था। लंका के हिन्दू मंदिरों के भग्नावशेषों में नटराज शिव, पार्वती, गणेश, कार्तिकेय,विष्णु, लक्ष्मी, सूर्य,बालकृष्ण, हनुमान आदि की कितनी ही मूर्तियाँ मिली हैं जो ताम्र या कांस्य से निर्मित है। ये सब हिन्दू मूर्तिकार के अनुसार है। भारत की गुप्त और पल्लव शैलियों में निर्मित ये मूर्तियाँ लंका में भारत के सांस्कृतिक प्रभाव को निरूपित करती है।

4.सम्राट अशोक, महेन्द्र और संघमित्रा का योगदान

श्रीलंका में बौद्ध धर्म का प्रचार- दीपवंश और महावंश में लंका का पुरातन इतिहास संकलित है। इसके अनुसार विजयसिंह के कोई संतान नहीं थी। उसने लाट देश में अपने भाई को लंका आने का और राजगद्दी संभालने के लिए कहा पर उसका भाई स्वदेश छोड़कर लंका नहीं आ सका। उसका पुत्र (विजयसिंह का भतीजा) पाण्डु वासुदेव लंका आ गया और विजय सिंह के पश्चात वहाँ का राजा बना। उसकी तीन पीढ़ि बाद देवानांपिय तिस्य लंका के राजसिंहासन पर आरूढ़़ हुआ। वह राजा अशोक का समकालीन था और उसने मौर्य सम्राट4 के पास विविध प्रकार के बहुमूल्य भेंट-उपहारों के साथ एक दूतमण्डल भी प्रेषित किया था। इस समय तक लंका के लोग बौद्ध धर्म के संपर्क में नहीं आये थे। वहाँ उस धर्म का प्रवेश देवानांपिय तिस्स के समय में हुआ और अशोक के पुत्र महेन्द्र तथा पुत्री संघमित्रा ने इसमें महत्वपूर्ण कार्य किए। अशोक के ही समय में आचार्य मोग्गलिपुत्र तिस्स की अध्ययक्षता में बौद्धों की तीसरी संगीति (महासभा) का आयोजन हुआ था। इसके द्वारा संघ की आंतरिक मतभेदों को दूर कर विदेशों में बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए योजना तैयार की गई थी। जो प्रचारक मंडली लंका भेजी गई थी उसका नेता स्थविर महेन्द्र था। इसके साथ अनेकों और भी स्थविर गये थे जिनके नाम इट्ठिय, उत्तिय, सम्बल और भद्दसाल थे।

महेन्द्र (राजा अशोक का पुत्र) तीसरी बौद्ध संगीति तक प्रव्रज्या ग्रहण कर बौद्ध भिक्षु बन चुका था। साथ महेन्द्र की छोटी बहन संघमित्रा भी भिक्षुव्रत ग्रहण कर चुकी थी।

लंका का राजा तिस्स ने राजा अशोक5 के पास जो दूतमण्डल भेजे थे, उस मंडल का नेता तिस्स का भानजा महाअरिट्ठ था। पाँच महीने तक यह दूतमण्डल पाटलिपुत्र में रहा था। राजा अशोक ने महाअरिठट्ठ को विदा करते हुए, तिस्स के पास सन्देश भेजा कि 6

— ‘‘मैं बुद्ध की शरण में चला गया हूँ, मैं धम्म की शरण में चला गया हूँ,मैं संघ की शरण में चला गया हूँ मैंने शाक्य मुनि के धर्म का उपासक होने का व्रत ले लिया है। तुम भी इसी बुद्ध, धम्म तथा संघ के त्रिरत्न का आश्रय लेने के लिए मन को तैयार करो। ‘जिन’ के उच्चतम धर्म का आश्रय लो। बुद्ध की शरण में आने का निश्चय करो। जब अशोक का यह सन्देश लेकर महाअरिटठ लंका वापस जा रहा था, उधर स्थविर महेन्द्र लंका में धर्मप्रचार के लिए अपने साथियों के साथ जाने को कटिबद्ध था। महेन्द्र ने राजा अशोक की अनुमति से लंका जाने से पूर्व अपने माता और सगे संबंधियों से मिलने का विचार किया। महेन्द्र ने अपनी माता जो उन दिनों विदिशा में रह रही थी से मिलकर बहुत प्रसन्न हुआ। विदिशा से महेन्द्र सीधे लंका गया। महेन्द्र अनुराधपुर से आठ मील पूर्व ही उतर गया। जिस जगह पर वह उतरा, उस जगह का नाम ‘महिन्दतल’ पड़ गया। इधर महाअरिट्ठ के द्वारा अशोक के संदेश को प्राप्त कर राजा तिस्स पहले ही बौद्धधर्म के प्रति अनुराग रखने लगा था। जब महेन्द्र के आगमन का समाचार मिला तो उसने महेन्द्र से मिलने के लिए गया। महेन्द्र ने राजा तिस्स को चूलहत्थिपदोपम सुत का उपदेश दिया। उपदेश सुनकर तिस्स ने चवालीस हजार मनुष्यों के साथ बौद्ध धर्म की दीक्षा ग्रहण की।7

राजकुमारी अनुला ने भी बौद्धधर्म में दीक्षित होने की इच्छा प्रकट की। पर महेन्द्र ने कहा हमें स्त्रियों को प्रव्रज्या देना विहित नहीं है। महेन्द्र ने इस कार्य हेतु अपनी छोटी बहिन संघमित्रा को बुलवाया। इस कार्य हेतु राजा तिस्स ने एक बार फिर महाअरिट्ठ के नेतृत्व में दूतमण्डल राजा अशोक के पास भेजा। 8राजा अशोक ने बौ़द्ध धर्म के प्रचार के लिए अपनी पुत्री संघमित्रा को लंका जाने की अनुमति प्रदान की साथ ही में बोधिवृक्ष की शाखा को साथ में भेजने के लिए बड़े समारोह के आयोजन के साथ भेजा गया। लंका में बड़े ही सम्मानपूर्वक बोधिवृक्ष की शाखा को आरोपित किया गया। अनुराधपुर के महाविहार में यह वृक्ष अब तक विद्यमान है और संसार के पुराने वृक्षों में से एक है। इधर संघमित्रा लंका पहुँची तो राजकुमारी अनुला ने पाँच सौ राजकन्याओं तथा पाँच सौ अन्तःपुर की स्त्रियों के साथ उसने प्रव्रज्या ग्रहण की। महेन्द्र तथा संघमित्रा का शेष जीवन बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार में ही व्यतीत हो गया। जब इन भाई-बहन की मृत्यु हुई तो उस समय राजसिंहासन पर राजा उत्तिय विराजमान थे। तिस्स की मृत्यु पहले ही हो गई थी। इस तरह से लंका में बौद्धधर्म के प्रचार-प्रसार का प्रधान श्रेय महेन्द्र और संघमित्रा को जाता है।

5.बौद्ध ग्रंथों का संकलन एवं आन्तरिक मतभेद

राजा तिस्स के बाद उसका भाई उत्तिय राजा बना। उत्तिय के बाद दो अन्य राजा बने। इनमें अंतिम सूरतिस्स था, इसके शासनकाल में दक्षिणी भारत के तमिल लोगों ने सिंहल पर आक्रमण कर उतरी भाग को जीत लिया था। लंका के तमिल शासकों में एलार का नाम उल्लेखनीय है। यह एक न्यायप्रिय राजा था। पर तमिल लोग ज्यादा देर तक शासन लंका में नहीं कर पाये। दुट्ठगामी नामक एक प्रतापी सिंहल राजा ने तमिलों को परास्त कर दिया और लंका में पुनः राजनीतिक एकता स्थापित की और अनुराधपुर के अंतर्गत संपूर्ण देश पर शासन किया। इसने लंका की राजशक्ति को पुनः स्थापित कर, बौद्ध धर्म के उत्कर्ष के लिए कई महत्वपूर्ण कार्य किए। दुट्ठगामी के द्वारा लंका का सबसे बड़ा स्तूप रत्नमाल्य चैत्य बनवाया गया। इसका शासन काल बौद्धधर्म के लिए विशेष महत्व का था। अब तक बुद्ध के उपदेश लेखबद्ध नहीं हुए थे। स्थविरों तथा भिक्षुओं को कंठस्थ याद रहते थे। लंका में बाहरी आक्रमण तथा एक बार दुर्भिक्ष पड़ा जिसके फलस्वरूप राजा को चिंता सताने लगी कि कहीं बुद्धवचन का स्मरण करना कठिन ना हो जाए। अतः उन्होंने सोचा बुद्ध वचन को लेखबद्ध कर दिया जाए। अनुराधपुर के महाविहार में भिक्षुओं का महासंघ एकत्र हुए तथा अष्टकथाओं का परायण किया गया। इसके पश्चात मातलेे के समीप अलुलेना गुहा में जाकर बुद्धवचन को लेखबद्ध कर दिया गया।

इसी समय लंका के बौद्धों में मतभेद होने लगा। राजा वट्टगामणी ने अभयगिरि नाम का विहार बनवाया तथा तिष्य नामक भिक्षु को प्रदान कर दिया था। तिष्य का संबंध राजवंश से था तथा उसका व्यक्तिगत आचरण ऐसा था कि भिक्षु असंतुष्ट हो गए और उन्होंने उसे संघ से बहिष्कृत कर दिया, पर तिस्य ने अभयगिरि विहार नहीं छोड़ा। इसी समय भारत के कुछ बौद्ध भिक्षु लंका आए। वे वज्जीपुत सम्प्रदाय के अनुयायी थे और आचार्य धर्मरूचि के शिष्य थे। लंका में अभयगिरि विहार9 में आश्रय लिया और इनके संपर्क में तिष्य तथा उसके अनुयायियों ने बौद्धधर्म का नया सम्प्रदाय स्थापित किया, जिसे धर्मरूचि निकाय नाम दिया गया। इस सम्प्रदाय ने मातले में लेखबद्ध हुए पालि त्रिपिटक के बजाय ‘वैपुल्यपिटक’ को अपना धर्मग्रंथ स्वीकार किया। वैपुल्य पिटक महायान सम्प्रदाय में मान्य था और इस प्रकार से लंका में बौद्ध संघ का केन्द्र अनुराधपुर का महाविहार था और धर्मरूचि निकाय का केन्द्र अभयगिरि बना। राजा वोहारिक तिस्स ने महाविहार के भिक्षुओं के प्रभाव में आकर अभयगिरि सम्प्रदाय को दबाव डालने का प्रयास किया जिससे संघ में कुछ समय के लिए शांति तो हुई लेकिन शीघ्र ही अभयगिरि के भिक्षुओं ने फिर अपना सिर उठाने की सुगबुगाहट की। वे महाविहार के बौद्धसंघ के विरुद्ध प्रचार करने में लग गये। अभयगिरि विहार के बौद्धों ने वैतुल्यवाद का प्रचार किया। इनके अनुसार संघ के लिए किसी भी प्रकार का दान लेना अनुचित था। यह वैतुल्यवादी महाशून्यवादी भी कहे गये हैं। इस दर्शन के अनुसार शाक्यमुनि ने स्वयं जन्म नहीं लिया। वे तुषित स्वर्ग मेें रहे। आनंद ने धर्मोपदेश दिया। इस प्रकार का विचार सद्धर्मपुएडरीक में भी मिलता है। मध्य एशिया के काश्गर स्थान से प्राप्त सद्धर्मपुएडरीक के हस्तलेख में वैतुल्यसूत्र का होना इस प्रसंग में उललेखनीय है। इस प्रकार स्पष्ट है कि वैतुल्यवादी महायानी थे।

राजा गोठामय ने महाविहर का पक्ष लेकर धर्मरूचि निकाय की सत्ता को कानून के विरूद्ध घोषित कर दिया और उसके साठ हजार स्थविरों को देश छोड़ कर जाने को विवश कर दिया। लंका के ये स्थविरों दक्षिण भारत गये और वहाँ के बौद्धों के सम्मुख अपने ऊपर हुए अत्याचारों को बताया जो राजा गोठामय के द्वारा वैपुल्यवादी (धर्मरूचि) निकाय पर किये गये थे। एक वैपुल्यवादी भिक्षु लंका पहुँच राजा गोठामय के दोनों पुत्रों का शिक्षक बन गया। राजा के छोटे राजकुमार महासेन उससे बहुत प्रभावित हुआ। राजा का बड़ा पुत्र जेट्ठतिस्य था जो राजा की मृत्यु के बाद राजसिंहासन पर बैठा लेकिन इनका शासन काल 10 वर्ष रहा। इसके पश्चात महासेन अनुराधपुर के राजसिंहासन पर आरूढ़ हुआ। महासेन संघमित्र से अधिक प्रभावित था इसलिए महाविरों के भिक्षुओं को धर्मरूचि निकाय को अपना लेने का आदेश दिया, जब वे लोग नहीं माने तो उनपर अत्याचार करने लगें धीरे-धीरे अभयगिरि निकाय का प्रभाव कम हो गया। अंत में भारत से सिंहल जाकर आचार्य ज्योतिपाल ने वैपुल्यपिटक के दोषों को दिखलाया। ज्योतिपाल आचार्य के प्रचार का यह परिणाम हुआ कि लंका से महायान सम्प्रदाय की उस शाखा का लोप हो गया, जो धर्मरूचि या वैपुल्यवाद निकाय के रूप में वहाँ के महासंघ की व्यवस्थाओं तथा नियमों का पालन करने लगे।

फिर भी लंका में हीनयान का मार्ग अभी निष्कण्टक नहीं हुआ था। सातवीं सदी में भारत में बौद्धधर्म के अन्य सम्प्रदाय का बीजारोपण हो गया था। जिसे व्रजयान के रूप में देखा गया है। आठवी- नौवीं सदियों में व्रजयान ने बहुत उन्नति की और महायान का प्रमुख सम्प्रदाय बन गया था। इस सम्प्रदाय में तंत्र-मंत्र को बहुत महत्व दिया गया था और सिद्धि प्राप्त करने के लिए अनेकविध गुह्य अनुष्ठान किये जाते थे। नौवीं सदी के प्रारंभ में व्रजयान सम्प्रदाय का एक भिक्षु लंका गया और अपने मत का प्रचार करने में उसे अच्छी सफलता मिली। वहाँ के राजा को भी अपने प्रभाव में ले लिया। इसी का परिणाम हुआ कि लंका में व्रजयान के सूत्रों का पठन-पाठन होने लगा, लोग तंत्र-मंत्र के साधन में लग गये। अनुराधपुर के महाविहार भी व्रजयान के प्रभाव से अपने को नहीं बचा सका। अनुराधपुर भग्नावशेषों का उत्खनन करते हुए एक स्तूप के खण्डहरों में तेरह ताम्रपत्र मिलें हैं, जिनपर व्रजयान के अनेक मंत्र उत्कीर्ण है। ये ताम्रपत्र आठवीं-नौंवी सदी के माने गए हैं,जिससे यह ज्ञात होता है कि उस काल तक लंका में व्रजयान का प्रवेश हो चुका था।

6.दक्षिण भारतीय राजवंशों के आक्रमण एवं प्रभाव

बौद्धों की पारस्परिक मतभेदों के कारण लंका में बौद्धधर्म की क्षति पहुँच रही थी, पर इससे भी अधिक क्षति तमिल देश के आक्रमणों से हो रही थी। दक्षिण भारत के तमिल10 राज्य लंका के पड़ोसी देश है। कुछ मील चौड़ा ये समुद्र ही उन्हें एक दूसरे से पृथक करता है। तमिल (चोल) देश के महत्वकांक्षी राजा अपने राज्य विस्तार करते हुए लंका पर आक्रमण करते रहते थे अनेक बार उनको सफलता भी प्राप्त हुई। एलार द्वारा लंका के उतरी प्रदेशों में अपने तमिल राज्य की स्थापना का उल्लेख प्राप्त होता है।

दूसरी सदी ई. के अंतिम चरण में गजबाहु या गजबाहुकगामणी अनुराधपुर के राजसिंहासन पर विराजमान हुआ। वह बहुत ही शक्तिशाली राजा था। उसने न केवल अपने सभी विरोधियों का दमन किया, व लंका में राजनीतिक एकता स्थापित की,अपितु चोल देश पर आक्रमण भी किया। दक्षिण भारत में आगे बढ़ते हुए वह तिरूचरापल्ली तक आ पहुँचा। वहाँ आकर उसने चोल देश के राजा के साथ संधि कर ली,जिसके परिणाम स्वरूप लंका में अनेक हिन्दू मंदिरों का निर्माण किया गया। चोल देश के राजा तथा निवासी पौराणिक हिन्दू धर्म के अनुयायी थे जबकि लंका बौद्ध धर्म के। पर लंका में भी तमिल जाति के लोग बहुत से बसे हुए थे जिनका अपना राज्य भी उत्तरी प्रदेशों में रह चुका था। ये सब पौराणिक धर्म को मानते थे। इसलिए गजबाहु ने जब चोल राज्य से संधि, कर ली और उनके संबंध मैत्रीपूर्ण हो गये, तो लंका में हिन्दू मंदिरों के निर्माण का मार्ग प्रशस्त हो गया था। पुराने समय के हिन्दू मंदिर तथा उसके अवशेष अभी भी वहाँ विद्यमान है। पर लंका और तमिल राज्य का सौहार्दपूर्ण संबंध ज्यादा देर तक नहीं चली। चोल सेनाओं ने शीघ्र ही लंका पर आक्रमण करने का प्रयास किया जिसके कारण अनुराधपुर आदि के विहारों को क्षति पहुँचती रही। लंका पर दक्षिणी भारत से एक बहुत बड़ा आक्रमण नौंवी सदी के मध्यभाग में उस समय हुआ, जब सेन शीलमेघ अनुराधपुर के राजसिंहासन पर विराजमान था। यह आक्रमण पाण्डय देश के राजा श्रीमार श्री बल्लभ द्वारा किया गया था। अनुराधपुर पाण्डय सेनाओं के सामने टिक नहीं पाया और उसपर कब्जा हो गया। शीलमेघ के राजकोष में जो भी बहुमूल्य वस्तुएँ थी,विहारों में सोने की मूर्तियाँ आदि थी, जो धन संपत्ति संचित थी, पाण्डय सेना द्वारा सभी पर कब्जा हो गया। सेन शीलमेध ने पाण्डय राजा की अधीनता स्वीकार कर लेने में ही अपना हित समझा और उसे अपना वशवर्ती बनाकर श्रीमान श्री बल्लभ अपने देश को वापस लौट गया। पर शीघ्र ही लंका को अपने देश को वापस लौट गया। शीघ्र ही लंका को अपने अपमान का प्रतिशोध लेने का अवसर मिल गया। सेन शीलमेध के उत्तराधिकारी सेन द्वितीय के शासनकाल में पाण्डय देश के एक राजकुमार ने अपने पिता के विरुद्ध विद्रोह कर लंका में आश्रय ग्रहण किया और सेन द्वितीय से पाण्डय पर आक्रमण करने के लिए अनुरोध किया। लंका की सेना ने पाण्डय पर आक्रमण कर उसकी राजधानी मदुरा पर कब्जा कर लिया और अनुराधपुर तथा अन्यत्र से जो बहुमूल्य वस्तुएँ तथा सोने की मूर्तियाँ इत्यादि श्रीमार श्रीबल्लभ द्वारा पाण्डय देश ले जायी गई थी वे सब पुनः लंका वापस ले आयीं गयी। अनुराधपुर का जो विनाश श्रीमार श्रीबल्लभ द्वारा किया गया था उसकी क्षतिपूर्ति नहीं हो सकी। यद्यपि पाण्डय देश को लंका द्वारा परास्त कर दिया गया था पर इससे लंका बाहरी आक्रमणों से भयमुक्त नहीं हो सका। दक्षिण भारत में चोल राज्य बहुत तेजी से उन्नति के मार्ग पर अग्रसर था। चोल राज्य के राजा परान्तक प्रथम ने पाण्डय देश को जीतकर ‘मदुरान्तक’ और ‘मदुरैकोण्ड’ (मदुरा का विजेता) की उपाधियाँ ग्रहण की। पाण्डय को जीत कर उसने लंका पर भी आक्रमण किया और वहाँ के राजा उदय चतुर्थ को परास्त कर लंका के उत्तरी प्रदेशों पर कब्जा कर लिया। इस आक्रमण से लंका के अनेक विहारों का नाश हो गया। परान्तक देर तक लंका पर अपना कब्जा नहीं रख सका इसी समय राष्ट्रकूटों ने उत्तर-पश्चिम की ओर से चोलों पर आक्रमण कर दिया। जिसका मुकाबला करने के लिए परान्तक को लंका से प्रस्थान करना पड़ा। परान्तक प्रथम के उतराधिकारियों में राजराज प्रथम अत्यंत प्रतापी था। पाण्डय और केरल पर अपने प्रभुत्व स्थापित करने के बाद वे लंका पर भी आक्रमण किया और उसके उत्तरी प्रदेशों को अधिगत कर उन्हें मुम्मुडी-चोलमण्डलम् नाम दिया। लंका के कतिपय ग्राम उस द्वारा तांजोर के हिन्दू मंदिरों को दान के रूप में भी दे दिया गया था। राजराज प्रथम के बाद राजेन्द्र चोल साम्राज्य का स्वामी बना। यह बहुत ही प्रतापी राजा था इसे केवल उतरी लंका से संतुष्टी नहीं मिल रही थी। इसने लंका के दक्षिणी प्रदेशों को भी जीत लिया। लंका के राजकोष में जो भी संपत्ति थी सबको अपने साथ ले गया। यहाँ तक की महेन्द्र पंचम की महिषी (पटरानी) को भी ले गया। महेन्द्र ने अपनी जान बचाने के लिए जंगल में भाग गया। पर उसे भी पकड़ लिया गया और चोल देश लाया गया। राजेन्द्र ने लंका के बहुत से विहारों को नष्ट कर दिया।

महेन्द्र पंचम का पुत्र कश्यप अभी लंका में ही था। लंका के दक्षिण प्रदेश में वह जीवन व्यतीत कर रहा था। राजेन्द्र ने उसे भी पकड़ कर कैद में डालना चाहा पर कश्यप उसके हाथ नहीं आया। कश्यप, रोहण नामक स्थान पर निवास करते हुए अपने राजकुल की मर्यादा को अक्षुण्ण बनाए रखा पर चोल सेना वहाँ भी उसे शांतिपूर्ण नहीं रहने दिया। 1039 ई॰ में कश्यप की मृत्यु हो गई। पर उसके उत्तराधिकारियों पर चोल सेनाएँ निरंतर आक्रमण करती रही। राजेन्द्र के उतराधिकारियों चोल सम्राट राजाधिराज ने अपने एक शिलालेख में दावा किया है कि उसने सिंहल के चार राजाओं को राजमुकुटों से वंचित किया था। इन राजाओं में विक्रमबाहु,विक्रमपाण्डय, वीरशिलामेध और श्रीबल्लभ मदनराज थे। इसमें संदेह नहीं कि ग्यारहवीं सदी में लंका पर चोल सम्राट का प्रभुता स्थापित थी।

7.बौद्ध धर्म का पुनरुत्थान एवं पुनर्निर्माण

लंका पर चोलों का प्रभुत्व ज्यादा देर तक कायम नहीं रह सका। ग्यारहवीं सदी के उत्तरार्द्ध में वहाँ के पुराने राजवंश के साथ संबंध रखने वाले एक वीर पुरुष ने अपने देश को चोलों की अधीनता से स्वतंत्र किया। यह प्रतापी पुरुष कीर्ति या विजयबाहु श्रीसंघबोधि था। चोलों के विरुद्ध उसने अनेकों युद्ध किए और अपने देश के स्वतंत्रता-संघर्ष में सहायता प्रदान करने के लिए बर्मा के बौद्ध राजा अनिरूद्ध से प्रार्थना की। पर बरमी सेनाओं के लंका पहुँचने से पूर्व ही विजयबाहु चोलों को पराभूत करने में सफल रहे। लंका को स्वतंत्र कर उसने पोलन्नरूव को अपनी राजधानी बनाया और इसका नाम बदलकर विजयराजपुर कर दिया गया। लंका के इतिहास में बिजयबाहु का स्थान अत्यंत महत्व का है। उसने न केवल अपने देश को स्वतंत्र किया अपितु बौद्धधर्म11 की श्रीवृद्धि के लिए भी अनेक कार्य किए। चोलों के आक्रमणों से लंका के बौद्धधर्म को बहुत क्षति पहुँची थी। बहुत से विहार नष्ट हो गये थे और बौद्धग्रन्थ भी नष्ट कर दिए गये थे। भिक्षु इतने कम रह गए थे कि संघ के नियमों के अनुसार पाँच का कोरम भी पूरा नहीं हो पाता था। इस दशा में विजयबाहु का ध्यान बर्मा की ओर गया जहाँ अनिरूद्ध का शासन था और वहाँ बौद्धधर्म खूब फल-फूल रहा था। उसने अनिरूद्ध को धर्मग्रन्थ तथा भिक्षु भेजने के लिये लिखा, ताकि लंका में बौद्धधर्म को पुनः स्थापित किया जा सके। अनिरूद्ध ने विजयबाहु की प्रार्थना स्वीकार कर ली और उसके द्वारा भेजे गये भिक्षुओं ने लंका आकर वहाँ के युवकों को नियमपूर्वक भिक्षुव्रत की दीक्षा दी। इस प्रकार लंका में बौद्धधर्म के पुनरूत्थान हुआ।

विजयबाहु के उत्तराधिकारी पराक्रमबाहु भी बहुत प्रतापी राजा थे। उसकी नौसेना भारत तथा दक्षिण-पूर्वी एशिया के कम्बुज देश पर आक्रमण किया और लंका की विजयपताका फहराई। अपनी राजधानी पोलुन्नसव12 (विजयराजपुर) में लंका की पुरानी राजधानी अनुराधपुर का भी जीर्णोद्धार किया और वहाँ भी अनेक नये विहार बनवाये। महायान सम्प्रदाय का वैपुल्यवाद निकाय अब तक लंका में विद्यमान था। उसे दबाकर महाविहार के प्रभाव को स्थापित किया गया। बौद्ध संघों पर भी इस राजा ने नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास किया। राजा ने इस बात का ध्यान रखा कि कोई अयोग्य व्यक्ति भिक्षु न बन सके और भिक्षुओं की शिक्षा-दीक्षा भी भली भांति हो सके। इसके लिए राजा ने शासन की ओर से अनेक आदेश जारी किए। बौद्ध साहित्यों को भी समृद्ध करने का प्रयास किया। उसके संरक्षण में स्थविर काश्यप के तत्वाधान में त्रिपिटक की अट्ठकथाओं पर कितनी ही महत्वपूर्ण टीकाएँ लिखी गई।

8.यूरोपीय औपनिवेशिक काल और चुनौतियाँ

इसके पश्चात् पराक्रमबाहु के जो उत्तराधिकारी हुए, वे अयोग्य, निर्बल थे। लंका में फिर से अशांति और अव्यवस्था शुरू हो गई। कोई भी ऐसा शक्तिशाली राजा नहीं था जो सुचारू रूप से शासन कर सके। तेरहवीं से सोलहवीं सदी तक लंका इसी दशा में रही। इसके पश्चात समय-समय पर पोर्तुगीज ने अफ्रीका महाद्वीप का चक्कर लगाकर एशिया के देशों में आना-जाना प्रारंभ कर दिया था। पोर्तुगीज लोग व्यापार के साथ-साथ ईसाई धर्म का भी प्रचार-प्रसार में लगे थे। वे बलपूर्वक लोगों को ईसाई बनाने का प्रयास कर रहे थे। 1552 ई॰ में लंका के राजसिंहासन पर भुवनैकबाहु आसीन था। उसने पोर्तुगीज से मैत्री व्यवहार किया पर पोर्तुगीज इसका अनुचित लाभ उठाना चाहा। भुवनैकबाहु के पुत्र धर्मपाल को ईसाई बना लिया और उसका नाम दॉन जुवान रख दिया। पोर्तुगजी दरबार के बहुत से व्यक्ति को ईसाई धर्म में प्रविष्ट कर दिया। ऐसे समय में लंका के राजकुल के एक कुमार राजसिंह ने पोर्तुगीज के विरुद्ध तलवार उठाया, पर वह राजकुमार राजसिंह भी बौद्धधर्म का कट्टर शत्रु था। उसने स्वयं अपने पिता की हत्या कर दी थी। पोर्तुगीज के तरह राजकुमार भी भिक्षु संघ पर अत्याचार प्रारंभ किए और विहारों तथा मंदिरों को लुटना एक आम बात हो गई। भिक्षुओं ने जंगल में भाग कर अपनी जान बचायी।

राजसिंह के उत्तराधिकारी विमलसिंह सूरी ने इस दशा में सुधार करने का प्रयास किया पर पोर्तुगीज के अत्याचारों को रोक नहीं पाया। वस्तुतः सोलहवीं सदी के बाद लंका की राजशक्ति क्षीण हो गयी। देश की राजनीतिक एकता का अंत हो गया।

सत्रहवीं शताब्दी के मध्य तक पोर्तुगीज की शक्ति क्षीण होने लगी। जिसका लाभ डचों ने उठाया। डच13 पोर्तुगीज के तरह अत्याचारी व धर्मान्ध नहीं थे। लंका के आर्थिक, राजनीतिक जीवन पर उन्होंने अपना प्रभाव अवश्य स्थापित कर लिया था पर धर्म के क्षेत्र में वे हस्तक्षेप नहीं करते थे। पोर्तुगीज और राजसिंह के कारनामों के कारण लंका तहस-नहस हो गई थी। इस दुर्दशा को देखकर शरणंकर युवा ने पुनः स्थापित करने का कार्य प्रारंभ किया। 1747 ई. में लंका के राजसिंहासन पर कीर्ति श्रीराजसिंह आरूढ़ हुआ था। शरणंकर के आग्रह पर राजा कीर्ति श्री राजसिंह ने अपने राजदूत इस प्रयोजन से सियाम भेजे ताकि वे वहाँ से कुछ स्थविरों व भिक्षुओं को लंका में बौद्ध संघ की पुनःस्थापना के लिये आमंत्रित कर सके। सियाम के राजा धम्मिक ने लंका के राजदूतों का अपनी राजधानी अयोध्या में स्वागत किया और सियाम के बौद्ध संघ के संघराज की स्वीकृति से महास्थविर उपालि को दस भिक्षुओं के साथ लंका भेजा गया। 1756 ई. की आषाढ़ पूर्णिमा के दिन काण्डी (श्रीवर्धनपुर) में सियाम के भिक्षुओं द्वारा लंका के अनेक व्यक्तियों ने प्रव्रज्या ग्रहण की और भिक्षु बन गये। शरणंकर भी इसमें एक था। इस प्रकार से लंका में बौद्ध संघ की पुनःस्थापना हुई और राजा कीर्ति श्री राजसिंह ने शरणंकर को लंका के बौद्ध संघ का संघराज नियुक्त कर दिया।

यद्यपि लंका में बौद्ध धर्म की पुनः स्थापना एक बार फिर से हुई, लेकिन इसके राजनीतिक दशा में विशेष सुधार नहीं था। लंका की राजनीतिक दुर्दशा का लाभ उठाकर अंग्रेज इसके स्वामी बन गये। लंका के अंतिम राजा विक्रमराजसिंह को निर्वासित कर अंग्रेजों ने इस देश के शासन को अधिकार में ले लिया। जो बीसवीं सदी के द्वितीय महायुद्ध के बाद ही उसने स्वतंत्रता हासिल की।

9.आधुनिक काल में बौद्ध पुनर्जागरण एवं भारत-श्रीलंका सम्बन्ध

1870 ई. में करीब यही समय था जब भारत में स्वामी दयानंद ने कार्यक्षेत्र में अपना कदम रखा था। इस समय सिंहल में एक तरूण श्रामणेर मिगोतुवत्त गुणानंद ने कमर बांधी। गुणानंद ने एक ईसाई स्कूल में शिक्षा पाई थी। जबर्दस्ती बाइबल पढ़ने का उन्होंने खूब लाभ उठाया। वह एक अच्छे लेखक और सुवक्ता तथा उससे भी बढ़कर वादपटु थे। उन्होंने ईसाई सिद्धांतों के विरुद्ध व्याख्यान और ईसाई उपदेशकों के साथ शास्त्रार्थ शुरू कर दिया। इससे बौद्धों में उत्साह बढ़ चला। ईसाई मिशनरियों ने सार्वजनिक सभा में एक शास्त्रार्थ कराना स्वीकार किया। शास्त्रार्थ के नियम तय हुए। कोलंबो से 16 मील पर अवस्थित पानादुरे स्थान से वह ऐतिहासिक शास्त्रार्थ हुआ। उस समय के प्रमुख अंग्रेजी दैनिक ‘सीलोन-टाइम्स’ ने14 रिपोर्ट लेने के लिए एक विशेष प्रतिनिधि भेजा था। रोज-रोज के सभी भाषण अंग्रेजी में प्रकाशित होते रहे। गुणानंद का पलड़ा भारी पड़ा। अपने-अपने भाषणों को वक्ताओं ने स्वयं संशोधित किया था जिसे ‘सीलोन-टाइम्स’ ने पुस्तक रूप में छाप दिया। इस शास्त्रार्थ में बौद्धधर्म के विरूद्ध कही जाने वाली सारी बातें ईसाईयों की ओर से कही गई थी। गुणानंद ने बड़ी योग्यता के साथ उनका उत्तर दिया और बौद्ध धर्म के सिद्धांतों का बड़ी निपुणता के साथ प्रतिपादन किया गया था। गुणानंद के आक्षेपों का उत्तर ईसाईयों की ओर से नहीं हो सका था। इसी समय एक अमेरिकन लेखक डॉ॰ पीकल सीलोन आया हुआ था। वह इस शास्त्रार्थ से बहुत प्रभावित हुआ और उसने उक्त पुस्तक को अमेरिका में ले जाकर छाप दिया। वह पुस्तक थियॉसोफिकल सोसाइटी के संस्थापकों कर्नल अल्काट और मदाम ब्लवेत्स्की के हाथ लगी। भिक्षुओं से पत्र-व्यवहार करके अंत में 1880 में लंका आकर उन्होंने खुले आम बौद्ध धर्म स्वीकार किया। उनके व्याख्यानों से बौद्धों में और भी ज्यादा जागृति पैदा कर दी।

अब स्थिति में सुधार होने लगी। महास्थविर धर्माराम और महास्थविर सुमंगल जैसे विद्वान भिक्षुओं ने विद्यालंकार (पेलियगोडा) और विद्योदम (कोलंबो) जैसे विद्यापीठ स्थापित किए, जिनमें सैकड़ो भिक्षु अध्ययन-अध्यापन करने लगे। कर्नल अल्काट के व्याख्यान से प्रभावित होकर एक सिंहल तरूण ने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए अपने जीवन का उत्सर्ग किया। यही तरूण अनागारिक धर्मपाल था,जिसने केवल लंका में ही घूम-घूमकर धर्म प्रचार नहीं किया, बल्कि शताब्दी के अंत होते-होते बुद्ध की जन्मभूमि भारत में आकर बुद्धधर्म की पताका फिर से गाड़ी।

1921 की जनगणना में सिंहलों की पूरी जनसंख्या का 9 सैकड़ा ईसाई (जिनमें सात सैकड़ा रोमन कैथलिक) था। पिछली तीन दशाब्दियों में बहुत से बड़े-बड़े परिवार दशों पीढ़ियों तक ईसाई रहने के बाद बौद्ध धर्म में लौट आए। सिंहल लोगों के लिए बौद्ध धर्म केवल धार्मिक विश्वास नहीं, बल्कि वह उनकी राष्ट्रीयता का भव्य-प्रतीक है। बौद्ध धर्म ने उन्हें भारत के साथ बड़े मधुर संबंध से बाँधा है, साथ ही वह यह भी भली प्रकार जानते हैं कि उनकी धमनियों में भी वहीं रक्त प्रवाहित हो रहा है, जो भारतीयों की धमनियों में है। उनकी भाषा उत्तरी भारत की भाषाओं की सगी बहन है, और संस्कृत शब्दों के लेने में उसी तरह उदार है, जैसे गुजराती, हिन्दी, बंगला आदि। इसीलिए जब कोई लंकापुत्र भारत को भारतमाता कहता है तो वह केवल शिष्टाचार के लिए नहीं कहता है।

10 संदर्भ

  1. सिंह, निशा, दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ भारत का व्यापारिक संबंध पृ. 165
  2. विद्यालंकार, सत्यकेतु, दक्षिण-पूर्वी और दक्षिण एशिया में भारतीय संस्कृति, श्री सरस्वती सदन,प्रकाशन, नई दिल्ली पृ. 300
  3. चौधरी, राधाकृष्ण, प्राचीन भारत का आर्थिक इतिहास, जानकी प्रकाशन, पटना पृ. 158
  4. सिंघल, सुदर्शना देवी, भारत और एशिया के अन्य देश, विद्याभवन राष्ट्रभाषा ग्रंथमाला पृ. 26
  5. पुरी, बैजनाथ, सुदूर पूर्व में भारतीय संस्कृति और उसका इतिहास पृ. 04
  6. विद्यालंकार सत्यकेतु, उपरोक्त, पृ. 302
  7. सांकृत्यायन राहुल, बौद्ध संस्कृति, सम्यक प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ. 72-75
  8. वही पृ. 76
  9. सिंघल, सुदर्शना देवी, उपरोक्त पृ. 28
  10. उपाध्याय, विद्यानन्द, दक्षिण-पूर्व एशिया का राजनीतिक इतिहास, बिहार हिन्दी ग्रंथ अकादमी,पटना पृ.
  11. पाण्डे, गोविन्द्र चन्द्र, बौद्धधर्म के विकास का इतिहास, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ पृ.106़-0
  12. मजूमदार, आर॰ सी॰, वृहत्तर भारत, राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी पृ. 40-41
  13. वाजपेयी, कृष्णदत्त, प्राचीन भारत का विदेशों से संबंध, कमल प्रकाशन, दिल्ली पृ0 151
  14. सांकृत्यायन, राहुल, उपरोक्त,पृ. 80-81

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